Monday, July 12, 2010

गले से उतरती नहीं बात...


तेज़ बनो ...भलाई का जमाना नहीं है
भला करोगी कुछ नहीं मिलेगा...
अपने बारे में सोचो ...खुद से मतलब रखो ...
और भी नहीं पता नहीं क्या-क्या ...
आते- जाते सिखा जाते हैं लोग ...
और मैं मौन ...
तमाम सवालों से घिरी रह जाती हूँ ...
कौन देगा जवाब ...
आप दोगे पापा ?...
या माँ तुम...?
बोलो ...
मैं ...जो मैं हूँ ...
जानती हूँ ...खुद को नहीं बदल पाउंगी ...
लेकिन जानती हूँ आज की इंसानियत
तभी तो ...केवल खुद से मतलब रखने की ...
गले से उतरती नहीं बात ...

Thursday, July 8, 2010

क्योंकि अब जीना है ...


जिंदगी बिताने को नहीं
अब जिंदगी को जीवन देने के लिए जीना है
बहुत हुआ अब दामन भिगोना ...
किसी की मुस्कान बनने को ...
अब जीना है
हमेशा ही चाहा कोई मार्गदर्शक ...
मगर अब ...
खुद किसी का सहारा बनने को जीना है
जिंदगी के रंगमंच पर एक बेहतरीन किरदार जीने को ...
अब मुझे जीना है ...
अतीत की तिलांजलि देकर ...
भविष्य खुशहाल बनाने को ...
अब इस वर्तमान में आत्मनिर्भर होकर...
मुझे जीना है ...

Sunday, July 4, 2010

मानव जीवन




यह कविता मैंने कॉलेज के दिनों में कॉलेज की ही मैगजीन के लिए लिखी थी ....जो प्रकाशित भी हुई थी ...इसे आज अपने ब्लॉग में शामिल कर रही हूँ ...



जल ,वायु ,मृदा ,अग्नि या आकाश ...


कौन आया पृथ्वी पर सर्वप्रथम


कितना अनबूझ है यह तथ्य ...


जीवन कि उत्पत्ति का


आखिर क्या था सर्वप्रथम ?


क्या गहन अन्धकार था ?


या थी रौशनी की चकाचौंध


क्या केवल जल हा जल था ?


या वनस्पति एकाकी ...


कुछ तो रहा होगा !


किसने देखा होगा वह रोमांचक प्रक्रम ...


जीवन की उत्पत्ति का !


आखिर क्या है सत्य जीवन का ?


क्या सृष्टि है ब्रह्मा की रचना ?


या माना जाए मिलर का प्रयोग...


जड़-तत्वों से बना चेतन !


क्या बना होगा जीवन...


उत्पत्ति के उन आठ चरणों में ?


या सचमुच रही होगी कोई ...


अदृश्य शक्ति !


कौन बताएगा ???


सत्य मानव जीवन का !!!


ग्रन्थ ?


विज्ञान ?


प्रज्ञा ?




Thursday, July 1, 2010

एक कविता


पढ़ा था कहीं...


कि मन के भावों को बस लिख भर देने से


बन जाती है कविता ...


तो फिर कहाँ हैं मेरी तमाम कवितायेँ


जो मैंने कभी लिखनी चाही थी


पर लिख नहीं पायी थी


भावनाओं के आगे बेबस हो जाती हूँ मैं


नहीं उठती कलम उन भावनाओं को लिखने को


जिन्होंने मुझे हजार बार तोडा है


मेरे हालातों पे मुझे ही तरस खाने को छोड़ा है


मुझे भयभीत किया है जमाने के डर से


रुलाया है मुझे स्याह रातों में


...वो सब बातें जो दुःख देती हैं मुझे


उन्हें कविता का रूप देने का साहस कहाँ से लाऊं मैं ...



Friday, May 28, 2010

किसी को अपनी जरूरत न हो तो क्या कीजे...


आज दिन बड़ा उदास बीता...कुछ भी करने की इच्छा नहीं हो रही थी ....दिमाग पर जोर डाल-डाल कर मैं थक गयी ...पर उदासी की वजह नहीं जान पायी...किसी से सुना था कि जब कभी बेवजह मन उदास हो तो रो लेना चाहिए...वो कोशिश मैंने भी की ...और जब आंसू आने शुरू हुए तो सोचने लगी कि मैं रो क्यों रही हूँ ...छि ...क्या मैं कायर हो गयी हूँ या मुझमे परिस्थितियों का सामना करने की हिम्मत नहीं है... फिर मैं चुप हुयी और खुद को दिलासा देने लगी ...फिर सोचने लगी कि दिलासा किस बात कि दे रही हूँ मैं ....सब तो ठीक है ...चल पागल ...कुछ भी सोच-सोच कर दिमाग ख़राब करती रहती है अपना ...हाँ लेकिन ये सच है कि आज सांस तक लेने में तकलीफ महसूस हो रही थी ....मैंने वो सब काम किये जिनसे मुझे ख़ुशी मिलती है ...लेकिन अफ़सोस मुझे कामयाबी नहीं मिली ....सबसे पहले अपना मनपसंद संगीत बजाया ...मधुशाला....हरिवंश राय बच्चन जी की इन गजलों को जब भी सुनती हूँ तो मन को असीम शांति मिलती है ...लगता है की मैं भी सुरा के प्याले में गोते लगा रही हूँ ....उनका एक एक शब्द उस धीमे और मधुर संगीत के साथ आत्मा में उतरने लगता है ...लेकिन आज उन शब्दों का बिलकुल विपरीत ही असर हुआ मुझ पर ....तर्पण-अर्पण करना मुझको पढ़-पढ़ कर के मधुशाला॥
मेरे अधरों पर हो न अंतिम वस्तु न गंगा जल प्याला॥
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे तुम रखना॥
राम -नाम है सत्य न कहना ...
कहना सच्ची मधुशाला॥
ये सब कुछ नया नहीं था मेरे लिए ..लेकिन ये सब सुनकर मन और उचाट हो गया ...मैंने म्यूजिक बंद किया ....जब इससे भी शांति नहीं मिली तो तार-वार सब निकाल कर उसे कबर्ड में डाल दिया ... ताकि वो मुझे दिखाई भी न दे ...फिर सोचा कुछ पढ़ लिया जाए ...ज्ञानवर्धक किताबें न पढ़कर मैंने मनोरंजक किताब 'सखी' उठाई ...कभी-कभी अच्छा लगता है फैशन परक किताबे पढ़ना ....लेकिन आज उसका भी मुझ पर उल्टा ही असार हुआ ....ऐसा लगा कि खुबसूरत लिबासों में सजी साड़ी मॉडल्स मुझे चिढ़ा रही हैं ....वो पन्ने मैंने जल्दी-जल्दी पलट दिए... और जब खाना खजाना की बारी आई तो मुझे किताब बंद करनी पड़ी ....क्योंकि मैं जानती थी कि अगर मुझे अभी कुछ अच्छा खाने का मन कर गया तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी ....अच्छा होगा कि इसे बंद कर दूँ ॥
मैंने आज जो महसूस किया वो बड़ा अजीब था ...ऐसा लग रहा था कि मेरा दिमाग बिलकुल खाली हो जाए ...या मैं थोड़ी देर के लिए गायब हो जाऊं ....किसी ऐसी जगह चली जाऊं कि मुझे ही कोई खबर न रहे ...मुझे मेरी कोई जरूरत ही ना रह जाए॥
बड़ी उठापटक के बाद शाम कोई जब ऑफिस आई तो भी लगा कि वही रोज़ की तरह बोझिल काम करुँगी ..लेकिन कैसे तैसे काम निपटाया ...और फिर सोचा कि कुछ लिखा जाए ...कई दिन हो गए ..मैं अभी थोडा ठीक महसूस कर रही हूँ ...इस उम्मीद पर जा रही हूँ कि शायद रात में अच्छी नींद आ जाये ....और आप लोगों को ये सुझाव जरूर देना चाहूंगी कि ...किसी को अपनी जरूरत न हो तो ....ब्लॉग लिखें ....

Thursday, April 29, 2010

कभी-कभी यूँ ही...




कभी-कभी यूँ ही गुमसुम रहना अच्छा लगता है
तमाम नजारों के बाद भी शून्य में देखना
अच्छा लगता हैं...
किसी कि परवाह किये बिना
पत्थर को ठोकर मारते हुए
आगे बढ़ना...
अच्छा लगता है
ग़मों को आंच न दूँ ...
न झूमूँ ख़ुशी में
इसीलिए तो कभी-कभी
संवेदनहीन होना अच्छा लगता है...
जब शहर में रौशनी को तरस रहे हो लोग
तब अँधेरे में खोना अच्छा लगता है...

Monday, April 19, 2010